ओरल कैंसरः परिवार बंधन से नहीं, हालातों से एकजुट होता है 

by Team Onco
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हजारों उलझनें आएं भले राहों में, कोशिशें करें बेहिसाब, इसी का नाम है ज़िन्दगी, बस चलते रहिये जनाब! ये लाइनें सचिन की ज़िन्दगी पर काफी फिट बैठती हैं। महाराष्ट्र के रहने वाले सचिन कुलकर्णी ने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि जिंदगी उनके सफर में एक ऐसा बदलाव लेकर आएगी। सचिन, जो लंबे वक्त से एक टीचर के तौर पर काम कर रहे थे, साल 2019 में अगस्त के महीने में उन्हें दांत के दर्द से जूझना पड़ा। अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ एक साधारण जीवन जीने वाले सचिन की ज़िन्दगी में साल 2019 में बहुत बड़ा बदलाव आया। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि, ये परेशानी आगे चलकर कैंसर का रूप ले लेगी। उन्हें ओरल कैंसर जैसी बीमारी से जूझना पड़ा। Onco.com से बात करते हुए सचिन ने बताया कि कैसे उनके जीवन में कैंसर ने दस्तक दी।  

सचिन ने बताया कि दांत में दर्द के दौरान वह लगातार बोलते थे, क्योंकि वह एक स्कूल में टीचर के रूप में कार्यरथ थे। उनके दांत की एक नोकीली धार से उनकी जीभ पर जख्म बन चुका था, जिसने आगे चलकर छाले का रूप ले लिया। यह छाला इतना भयानक हो गया कि न तो सचिन कुछ खा पाते थे, न ही पी पाते थे। एक ईएनटी सर्जन के पास जाने पर उन्हें बायोप्सी कराने की सलाह दी गई। हालांकि, इस दौरान उन्होंने सेकंड ओपिनियन भी लिया। जहां एम्स में उनकी बायोप्सी की गई और रिजल्ट पॉजिटिव आया। सचिन बतातें है कि कैंसर के बारे में पता चलने के बाद किसी को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। लगभग ढाई महीने तक उनके काफी अलग-अलग टेस्ट हुए और उनकी परेशानी बढ़ती गई। 

उपचार की प्रक्रिया

उपचार के दौरान उनकी सर्जरी की गई, जिसके बाद उन्हें कीमोथेरेपी भी दी गई। सर्जरी में उनकी 80 प्रतिशत तक जीभ काट दी गई थी। सचिन की पत्नी कंचन ने बताया कि कैंसर उनके पति के जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लेकर आया। शारीरिक और मानसिक तौर पर वह बेहद कमजोर हो गए थे। उपचार के दौरान जब उन्हें कीमोथेरेपी दी गई तो उसके दुष्प्रभाव में उनके पति को आईसीयू में रखना पड़ा। एक वक्त ऐसा आ गया था कि सभी ने उम्मीद छोड़ दी थी। सचिन उपचार से इस कदर हार चुके थे कि वह सुसाइड तक करना चाह रहे थे। एक वक्त के बाद वाह पढ़़ाव भी पार हुआ।

कंचन ने बताया कि एक पत्नी होने के नाते उन्हें अपने जीवन में ऐसा कुछ कभी नहीं देखा, ये वक्त उनके लिए बहुत ज्यादा भारी था। हालांकि उन्होंने और अपने बच्चों के साथ अपने पति का साथ दिया, साथ ही उपचार के पढ़ाव को बेहतर तरीके से पार किया। कंचन ने बताया कि कैंसर ने न सिर्फ उन्हें शारीरिक तौर पर प्रभावित किया, लेकिन इलाज के दौरान उनका घर और गाड़ी सब बिक गया। आज सचिन अपने परिवार के साथ जीवन बसर कर रहे हैं। 

इस दौरान सचिन के परिवार के अलावा उनके साथ के शिक्षक और बच्चों ने उनका काफी साथ दिया। परिवार के बाद उनके द्वारा पढ़ाए गए बच्चों ने उन्हें ठीक होने के लिए प्रेरित किया। 

 

हालातों के बोझ से थकी रूह, बनी मिसाल

ज़िन्दगी कभी आसान नहीं होती इसे आसान बनाना पड़ता है। बीमारी कोई भी हो इंसान को तोड़ने में ज़रा भी वक्त नहीं लगाती है, लेकिन कैंसर जैसी बीमारी को मात देने के बाद भी आज सचिन हम सभी के बीच हैं। लोग जहां छोटी-मोटी बिमारियों से ग्रस्त होने के बाद बिस्तर पकड़ लेते हैं, वहीं आज सचिन एक कंपनी में बतौर एचआर के रूप में काम कर रहे हैं, जो हम सभी के लिए एक मिसाल है। सचिन को कैंसर के बाद टीचर के रूप में नौकरी मिलना असंभव सा हो गया है, क्योंकि इस पेशे में उन्हें लगातार बोलना पड़ेगा और उपचार में उनकी 80 प्रतिशत जीभ काट दी गई है तो इसी कारण उन्हें शैक्षणिक संस्थान में एक टीचर के रूप में नौकरी नहीं मिल पा रही है। अपने हालातों का सामना करते हुए सचिन ने आज भी हार नहीं मानी है, अपनी पत्नी के साथ मिलकर वह अपनी आर्थिक जिंदगी को वापस पटरी पर लौटाने की कोशिश कर रहे हैं, जो काबिले तारीफ है। संघर्ष के बुरे दौर में भी जो हौसला नहीं खोते सफलता उन्हीं के हाथ लगती है। 

सचिन ने कई संघर्षों के बाद कैंसर को तो हरा दिया, लेकिन अब जिंदगी में उनका टीचर बने रहने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया। अब आगे चलकर उन्हें सबसे बड़ी परेशानी एक शिक्षक के रूप में नौकरी पाने में आ रही है। हालांकि एक प्राइवेट कंपनी में सचिन बतौर एचआर के रूप में काम ज़रूर कर रहे हैं, लेकिन आज भी शायद से अपने शिक्षक होने के आवेश को याद करते हैं। 

 

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