डाक्टर मेधी से जानें फेफड़ों के कैंसर के बारे में जरूरी बातें

by Team Onco
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कैंसर आज के वक्त में एक डर जैसा सा बन गया है जिसके नाम से लोग जीने की उम्मीद को छोड देते हैं। इसका एक मुख्य कारण लोगों में जागरूकता की कमी होना है, जिसके चलते लोग कैंसर के क्षेत्र में हुई प्रगति को जान नहीं पाए हैं।

एमबीबीएस (गोल्ड मेडल), एमडी डीएम (एम्स नई दिल्ली) डॉक्टर ऑन्कोलॉजी एंड सीनियर कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट बत्रा कैंसर सेंटर के 15 वर्षीय अनुभव डॉ कुंजहारी मेधी आज फेफड़ों के कैंसर से जुड़े कुछ सवालों के जवाब देंगे। इस वीडियो में हम कैंसर के लक्षण, निदान और इसके इलाज के विकल्पों के बारे में जानेंगे।

फेफड़ों का कैंसर और तंबाकू का सेवन

फेफड़ों का कैंसर क्या है?

फेफड़ों के कैंसर के बारे को अगर हम आसान भाषा में समझे तो यह एक ऐसी स्थिति है जब कोशिकाएं फेफड़ों में अनियत्रित रूप से विभाजित होती हैं। जिसके बाद यह ट्यूमर को जन्म देती है। यह हमारे शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, लेकिन जब यह फेफड़ों में पनपता है तो इसे फेफड़ों का कैंसर कहा जाता है। ट्यूमर भी इसमें दो प्रकार के होते हैं, बिनाइन और मेलिग्नेंट। बिनाइन ट्यूमर नॉन-कैंसरस होते हैं, जबकि मेलिग्नेंट ट्यूमर को कैंसरस माना जाता है। बिनाइन ट्यूमर शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं फैलता, जबकि मेलिग्नेंट ट्यूमर बेहद खतरनाक होता है, जो हमारे शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकता है। फेफड़ों का कैंसर भी कई प्रकार का होता, जिसके बारे में निदान के बाद ही पता लगाया जा सकता है। 

भारत में कुछ दशक पहले तक फेफड़ों का कैंसर टाॅप 5 कैंसरों में नहीं गिना जाता था, लेकिन अब यह पुरूषों में और महिलाओं में काफी आम है। एक वक्त ऐसा था जब लोगों को यह कैंसर एक उम्र के बाद होता था, लेकिन अब यह काफी कम उम्र 35 से 40 साल के उम्र के लोगों को भी हो रहा है। 

फेफड़ों के लिए तबांकू कितना खतरनाक होता है?

इसका एक कारण है तबांकू और सिगरेट का सेवन, जिससे सबसे ज्यादा ओरल कैंसर और हेड व नेक कैंसर के बाद फेफड़ों का कैंसर होता है। तबांकू किसी भी तरह से हानिकारक होता है, क्योंकि इसमें लगभग 400 प्रकार के केमिकल्स का उपयोग किया जाता है, जो कि कैंसर कारक होते हैं। इस वजह से जो भी लोग तबांकू का सेवन किसी भी व्यक्ति के लिए एक जोखिम कारक है।

क्या धूम्रपान न करने वालों को भी फेफड़े का कैंसर हो सकता है ?

जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि तंबाकू का सेवन किसी भी तरह से कैंसर को बुलावा देता है। इसका दूसरा कारण है वायु प्रदूषण। हवा में काफी ऐसे केमिकल होते हैं, जो हमारे शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। यह उन लोगों को भी प्रभावित करता है, जो लोग धूम्रपान का सेवन नहीं करते हैं, इसी के साथ रेडिएशन एक्सपोजर, तंबाकू का सेवन वायु प्रदूषण, केमिकल के धुएं का संपर्क, अस्वस्थ जीवनशैली इसके अन्य कारक हैं।

 

फेफड़ों के कैंसर लक्षण और निदान

 

प्रारंभिक अवस्था में फेफड़ों के कैंसर के कोई लक्षण क्यों नहीं होते हैं? फेफड़े के कैंसर का शीघ्र निदान कैसे संभव है ?

इसका एक मुख्य कारण ये है कि हमारे फेफड़े दो होते हैं, जिनमें से अगर एक खराब भी हो जाए, या यूं कहें कि हमारे फेफड़ों की 50 प्रतिशत तक कोशिकाएं काम कर पाएं, तो भी व्यक्ति को कोई खास परेशानी नहीं होती है। इसलिए शुरुआती चरणों में कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। ऐसे में जो लोग हाई रिस्क पेशेंट होते हैं, यानी कि जिन्होंने 20 साल से ज्यादा तंबाकू व सिगरेट का सेवन किया हो, उनमें कैंसर को डिटेक्ट करने के लिए स्क्रीनिंग के माध्यम से लो डोज सीटी स्कैन किया जाता है। जैसे कि 40 साल की उम्र में यदि कोई अपनी स्क्रीनिंग कराता है, तो शुरुआती स्टेज में कैंसर को डिटेक्ट किया जा सकता है और इसमें ठीक होने की संभावना भी काफी अधिक होती है। इस वजह से स्क्रीनिंग की जाती है, ताकि लक्षण आने से पहले ही हम कैंसर का पता लगा पाएं।

 फेफड़ों के कैंसर का निदान कैसे किया जाता है ?

फेफड़ों के कैंसर का निदान उसके लक्षणों पर आधारित होता है। इसके लिए हम हाई जैसे कि खांसी आना, बलगम में खून, छाती में दर्द महसूस होना, सांस फूलना (चलते-चलते या बैठे-बैठे), ऐसे कुछ आम लक्षण होते हैं, जो कैंसर के मरीजों में पाए जाते हैं। जब यह कैंसर एक भाग से दूसरे भाग में फैलने लगता है, इसे मेटास्टेटिक कहा जाता है। इस वजह से यह कैंसर जिस जगह फैलता है, वहां पर परेशानी पैदा करता है। तीसरा होता है लोकल एडवांस डिजिज, जब यह फेफडों के अंदर ही किसी भाग में फैला हो, यानी कहीं दूर नहीं गया हो तो इसमें अलग तरह से लक्षण दिखाई देते हैं। जैसे कि यदि यह प्लुरा में चला जाए तो इससे हमारे फेफडों में पानी इकट्ठा हो जाता है। इससे हमें दर्द हो सकता है और सांस फूलने की समस्या हो सकती है। जब सह कैंसर लिम्फ नोड में चला जाए तो, इससे आवाज़ में बदलाव, सांस में परेशानी, दिल की परेशानी और चेहरे पर सूजन आ सकती है। इन सबके लिए स्क्रीनिंग की जाती है।

वहीं दूसरा तरीका है रेडियोलॉजिकल टेस्ट। इसमें चेस्ट का एक्स-रे शामिल होता है। जिससे फेफड़ों की हालत का पता लगाया जाता है, जैसे कि वहां पानी भरा है या नहीं। साथ ही ये भी पता लगाया जाता है कि कहीं फेफड़ों में कोई मांस तो नहीं बढ़ गया है। इसके साथ ही कंट्रास्ट सीटी स्कैन की प्रक्रिया की मदद से यह पता लगाया जाता है कि कहीं कैंसर फेफड़ों के बाहर किसी और हिस्से में तो नहीं फैला है। इसके अलावा पूरे शरीर का पेट सीटी स्कैन कराया जाता है। रेडियोलॉजिकल टेस्ट के माध्यम से कैंसर की स्टेज का पता लगाया जाता है। वहीं बायोप्सी की मदद से भी कैंसर के प्रकार के बारे में पता लगाया जाता है। वहीं एडवांस टेस्ट में मॉलिक्यूलर टेस्ट या जेनेटिक टेस्ट किया जाता है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि कैंसर के लिए कौन से उपचार की जरूरत है। 

 फेफड़ों के कैंसर के चरण कितने होते हैं और इन चरणों से संबंधित ठीक होने की दर कितनी होती है ?

कैंसर की स्टेज उसके विभाजन पर निर्भर करती है। यह चरण टीएनएम स्टेजिंग के आधार पर विभाजित की गई हैं। जिसमें ट्यूमर का साइज, लिम्फ नोड के स्टेटस का पता लगाने के लिए और मेटास्टेटिक के बारे में जानने के लिए किया जाता है। इसको मोटे तौर पर चार चरणों में बाँटा गया है। कैंसर की पहली और दूसरी स्टेज को शुरुआती चरण कहा जाता है। इस स्थिति में कैंसर फेफड़ों के अंदर ही रहता है। स्टेज तीन में कैंसर यह फेफड़े से बाहर निकल जाता है, लेकिन छाती के भीतर ही रहता है। स्टेज तीन में यह लिम्फ नोड और प्लुरा तक फैल जाता है। स्टेज 4 को एडवांस कैंसर के रूप में जाना जाता है। 

स्टेज 1 में लगभग 80 से 90 प्रतिशत तक लोग ठीक हो जाते हैं। वहीं दूसरी स्टेज में 50 से 60 प्रतिशत लोग ठीक हो जाते हैं। तीसरी स्टेज में 25 प्रतिशत लोग ठीक हो जाते हैं। चौथी स्टेज बहुत खतरनाक होती है, जिसमें ठीक होने की संभावना बहुत कम होती है। इसमें 5 प्रतिशत से कम लोग ठीक होते हैं। 

 

फेफड़ों के कैंसर का इलाज

फेफड़ों के कैंसर का इलाज कैसे किया जाता है ?

फेफड़ों के कैंसर में सर्जन की भूमिका सर्जरी करने की होती है, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट की भूमिका रेडियोथेरेपी करने की होती है, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट द्वारा कीमोथेरेपी, बायोलॉजिकल थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, टारगेट थेरेपी की जाती है। इसमें दवाईयां या तो इंजेक्शन के जरिए दी जाती हैं, या फिर मौखिक रूप से। यह आपके कैंसर की स्टेज पर निर्भर करता है कि आपका इलाज कैसे किया जाएगा। पहली और दूसरी स्टेज, शुरूआती स्टेज में सबसे पहले सर्जरी की जाती है, उसके बाद बायोप्सी के आधार पर रेडियो थेरेपी या फिर कीमोथेरेपी की जाती है। वहीं तीसरी में स्टेज रेडियो थेरेपी या फिर कीमोथेरेपी की जाती है और स्टेज 3 B और चौथी स्टेज में सर्जरी का रोल कम होता है, इसमें एडवांस ट्रीटमेंट जैसे कि कीमोथेरेपी, बाॅयोलोजिकल थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, टारगेट थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। 

फेफड़ों के कैंसर के लिए रेडियोथेरेपी खतरनाक होती है?

रेडियोथेरेपी को लेकर लोगों के मन में मिथक बने हुए हैं। रेडियोथेरेपी के फील्ड इस हद तक प्रगति हुई है कि जिसकी वजह से हमारे स्वस्थ कोशिकाएं प्रभावित नहीं होती हैं, यह कैंसर की कोशिकाओं को सीधे तौर पर टारगेट करती है। यह बात भी सही है कि रेडियोथेरेपी के बाद थोड़े बहुत दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं, लेकिन वह इलाज का असर हमारी स्वस्थ कोशिकाओं पर पडने से होता है, इसलिए इस थेरेपी में हुई प्रगति से अब यह सीधे तौर पर ट्यूमर को नष्ट करती है। ऐसे में सह बिल्कुल खतरनाक नहीं है।

क्या हम फेफड़ों के कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी का उपयोग कर सकते हैं ? इस तरह के उपचार की सामान्य लागत क्या है ?

इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल आमतौर पर शरीर में मौजूद इम्यून कोशिकाओं की मदद से कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं को मारने के लिए किया जाता है। ये थेरेपी एडवांस ट्रीटमेंट के रूप में जानी जाती है। यह काफी महंगी होती है। जो पेटेंट ड्रग है, जो एक ही कंपनी द्वारा बनाई जाती है, और इसे कोई नहीं बना सकता है। इसका इस्तेमाल एडवांस स्टेज में किया जाता है। इसकी एक ड्रग है जिनका नाम है निवोलुमेब (Nivolumab) जिसके एक कोर्स की लागत लगभग दो लाख रूप होती है। जो 15 दिन में एक बार दिया जाता है, जिससे दो महीने में 4 लाख तक का खर्चा आ सकता है। वहीं दूसरी ड्रग है पेम्ब्रोलिजुमब (pembrolizumab) जो 21 दिन में एक बार दी जाती है। इसकी लागत लगभग 4लाख 20 हजार आती है।

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