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घर में इन गलतियों से आप दे रहें कैंसर को न्योता!

क्या आप सड़क के किनारे मिलने वाले न्यूज़पेपर में लिपटे पकौड़े, वड़े और भेल का आनंद लेते हैं। तब आप निश्चित ही अपने बहुमूल्य जीवन में कैंसर को न्योता दे रहे हैं। 

भारत में न्यूज़पेपर में लपेट कर खाना देना एक आम बात है। यह सालों से चली आ रही प्रथा है और अभी भी चल रही है, क्योंकि खाने को पैक, सर्व या ट्रांसफर करने का यह आसान और सस्ता तरीका है। स्याही खाने पर चिपक सकती है, इस बात की जानकारी के लिए लोगों में जागरूकता की कमी है कि जिसके कारण ऐसी गतिविधियां होती हैं। 

न्यूज़पेपर की स्याही खाने को दूषित करती है

शोध की मानें तो न्यूज़पेपर प्रिंट करने में जो स्याही का इस्तेमाल होता है उसमें ऐसे केमिकल होते हैं जो कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं। जब खाने के साथ ये केमिकल हमारी शरीर में जाते हैं तभी हम कैंसर के खतरे का सामना करते हैं। खासतौर से जब गर्म या तैलीय भोजन न्यूज़पेपर में लपेटे जाते हैं तब उस खाने में केमिकल जाने के ज्यादा आसार होते हैं। घर पर भी न्यूज़पेपर में डीप फ्राई खाने को छान कर निकालते हैं। यह खाने की क्वालिटी और सुरक्षा के लिए खतरा है।

“फूड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) के अनुसार, प्रिंट करने वाली स्याही में कार्सिनोजेन होते हैं। जब गर्म खाना न्यूज़पेपर में रखते हैं तब ये स्याही पिघल कर शरीर को कई स्वास्थ्य संबंधी खतरे के संपर्क में लाती है।”

न ही न्यूज़पेपर बल्कि एल्यूमीनियम या प्लास्टिक में लिपटा हुआ खाना भी नुकसानदायक है। दुर्भाग्यवश यह अस्वस्थ प्रैक्टिस पूरे भारत में फैली है।

क्या ये सच में कैंसर का कारण बनता है?

जरूरी नहीं है, लेकिन इसकी संभावना है। न्यूज़पेपर प्रिंट में इस्तेमाल होने वाली स्याही में कई बायो–एक्टिव होते हैं जैसे नैफ्थिलऐमिन, एरोमैटिक हाइड्रोजन और कार्बन कंपाउंड। ये कैंसर पैदा करने वाले मजबूत एजेंट हैं। न्यूज़पेपर में मिनरल ऑयल, पिगमेंट, एडिटिव और प्रिजर्वेटिव भी होते हैं।

इस मुद्दे पर किए गए कई शोधों से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि न्यूज़पेपर प्रिंटिंग में काम करने वाले कर्मचारियों को लंग कैंसर या ब्लैडर कैंसर होता है क्योंकि वे लगातार लंबे समय के लिए हानिकारक केमिकल जैसे नैफ्थिलऐमिन, बेंजोफेनोन, बेंजीडीन और 4–अमीनोबाईफिनाइल के संपर्क में रहते हैं।

यह पाया गया है कि बेंजोफेनोन गर्भवती महिलाओं और बच्चों में हार्मोन सिक्रीशन करने वाली ग्रंथियों को भी प्रभावित करते हैं।

यहां उन समस्याओं की लिस्ट है जो किसी को न्यूज़पेपर में लिपटा खाना खाने की वजह से हो सकती है –

  • मैनचेस्टर, इंग्लैंड में हुए एक एक्सपेरिमेंट के अनुसार, कई कर्मचारी जो न्यूज़पेपर प्रिंटिंग में काम करते हैं वे केमिकल के संपर्क में आने के कारण लंग कैंसर से प्रभावित होते हैं।
  • कर्मचारियों में ब्लैडर कैंसर अगला सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है और ये न्यूज़पेपर की डाई और स्याही से जुड़ा हुआ पाया गया।
  • ऐसे केमिकल के संपर्क में लंबे समय तक रहने के कारण हार्ट, हड्डी, किडनी, लंग, लिवर और ब्रेन में भी दिक्कत आ सकती है।
  • न्यूज़पेपर में लिपटे खाने की वजह से पाचन संबंधी दिक्कतें भी पाई गई हैं। 

मुख्य रूप से बूढ़े, बच्चे, टीनएजर और ऐसे लोग जिनके जरूरी अंगों में कोई कमी हो या इम्यून सिस्टम कमज़ोर हो उनमें कैंसर संबंधी दिक्कत होने का खतरा अधिक होता है। 

यह कहा जाता है कि न्यूज़पेपर में लिपटा हुआ खाना ज्यादा खाने से इंसान का स्वास्थ्य उतना ही खतरे में होता है, जितना एक कभी कभार सिगरेट पीने वाले का होता है।

यह ध्यान में रखें कि न्यूज़पेपर जिससे खाना लपेटा जा रहा है, वह कभी साफ नहीं होता है। वह ट्रांसपोर्ट हो कर आता है और बनने से लेकर वेंडर के हाथ में पहुंचने तक कई हाथों से हो कर गुजरता है। और साथ ही न्यूज़पेपर रिसाइकल किए गए पेपर से बनता है।

इस प्रक्रिया के दौरान दूषित होने की और बीमारी पैदा करने वाले कीटाणुओं के इकट्ठा होने की संभावना अधिक होती है। इसे न तो स्टेरलाइज कर सकते हैं और न ही धुल सकते हैं। तो इससे नुकसान दुगुना हो जाता है और स्वास्थ्य खतरे में रहता है।

क्या इसका कोई समाधान है?

बिलकुल है! खाना को स्टेनलेस स्टील, पत्ते या शीशे के बरतनों में सर्व करें या खाएं। ये हानिकारक बैक्टीरिया,केमिकल और कीटाणुओं से मुक्त होते हैं।

यहां खाने को पैक और सर्व करने के कुछ सेहतमंद विकल्प बताए जा रहे हैं:

स्टेनलेस स्टील, सी वुड, बैंबू और कॉर्नस्टार्च पैकेजिंग। ये इको फ्रेंडली और बायोडिग्रेडेबल पदार्थ होते हैं।

बायोडिग्रेडेबल फूड पैकिंग मटेरियल के इस्तेमाल से हमारे स्वास्थ्य या पर्यावरण को भी कम नुकसान होता है।

“जागरूकता फैलाएं और न्यूज़पेपर में खाना सर्व करने से मना करें।”

Team Onco

Helping patients, caregivers and their families fight cancer, any day, everyday.

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